रायपुर। वर्ष 2013 के झीरम घाटी नक्सली हमले से जुड़े अदालती रिकॉर्ड में दर्ज एक गवाही ने एक बार फिर इस मामले को चर्चा में ला दिया है। नंदकुमार पटेल के वाहन चालक की गवाही में कहा गया है कि परिवर्तन यात्रा के दौरान कवासी लखमा के मोबाइल पर बार-बार फोन कॉल आ रहे थे और वे गोंडी भाषा में बातचीत कर रहे थे। यह विवरण अभियोजन पक्ष के एक गवाह के बयान का हिस्सा है।
रास्ते में कई बार आए थे फोन
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, परिवर्तन यात्रा के दौरान कवासी लखमा तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल के वाहन में सवार थे। चालक ने अपनी गवाही में कहा कि रास्ते में लखमा के मोबाइल पर कई बार फोन आए और बातचीत गोंडी भाषा में हुई। गवाह के अनुसार, बातचीत में कुछ शब्द बार-बार सुनाई दे रहे थे।
नंदकुमार पटेल ने पूछा तो ‘डीजल-डीजल’ कहे जाने का जिक्र
गवाही में यह भी दर्ज है कि नंदकुमार पटेल ने लखमा से हिंदी में बात करने और बातचीत का मतलब बताने को कहा था। इसके जवाब में लखमा की ओर से कथित तौर पर ‘डीजल-डीजल’ कहे जाने का उल्लेख है। हालांकि, यह पूरी बात गवाह के बयान का हिस्सा है और अदालत ने इसे अपने आप में किसी साजिश का निर्णायक प्रमाण नहीं माना।
हमले के बाद जंगल में ले जाए गए थे चार लोग
अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक, झीरम घाटी में विस्फोट और गोलीबारी के बाद माओवादियों ने नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, वाहन चालक दशाराम सिदार और कवासी लखमा को जंगल की ओर ले जाया था।
वहां माओवादियों ने उनकी पहचान पूछी। रिकॉर्ड में दर्ज है कि नंदकुमार पटेल द्वारा अपना परिचय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में देने के बाद उन्हें और उनके बेटे को बांध दिया गया। बाद में लखमा और वाहन चालक को वहां से जाने के लिए कहा गया।
गोंडी में बातचीत का एक और उल्लेख
गवाह ने घटनास्थल पर कवासी लखमा और कथित माओवादी नेता विनोद के बीच गोंडी भाषा में बातचीत होने की बात भी कही है। रिकॉर्ड के अनुसार, करीब एक घंटे बाद नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद लखमा और वाहन चालक मोटरसाइकिल से दरभा थाने पहुंचे।
25 मई 2013 को हुआ था झीरम हमला
झीरम घाटी में 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर माओवादी हमला हुआ था। इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, महेंद्र कर्मा और विद्याचरण शुक्ल समेत कई लोगों की मौत हुई थी। NIA रिकॉर्ड के अनुसार हमले में 27 लोगों की मौत और 38 लोग घायल हुए थे।
गवाही को निर्णायक निष्कर्ष मानना उचित नहीं
करीब 13 साल बाद विशेष NIA अदालत के फैसले में दर्ज गवाहियों और साक्ष्यों के सार्वजनिक चर्चा में आने से घटना के कई पहलुओं पर फिर सवाल उठ रहे हैं।
हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि कवासी लखमा के फोन कॉल, गोंडी बातचीत और ‘डीजल-डीजल’ जैसे प्रसंग गवाह के बयान का हिस्सा हैं। इन्हें अपने आप में किसी व्यक्ति की भूमिका या किसी साजिश का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने भी इन तथ्यों को अलग से किसी अंतिम निष्कर्ष के रूप में स्थापित नहीं किया है।





