खैरागढ़। सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक समय पर पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन खैरागढ़ जनपद पंचायत की एक तस्वीर पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है। मनरेगा मजदूरों के लिए खरीदे गए 5,860 टिफिन डिब्बे पिछले करीब 10 साल से गोदाम में पड़े धूल खा रहे हैं। जिन गरीब मजदूरों के लिए ये टिफिन खरीदे गए थे, वे आज भी अपने हक का इंतजार कर रहे हैं।

मामला मुख्यमंत्री मनरेगा मजदूर टिफिन वितरण योजना से जुड़ा है।


15 हजार से ज्यादा टिफिन मिले, लेकिन हजारों अब भी बंद

जनपद पंचायत खैरागढ़ के रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2016-17 में उन परिवारों को टिफिन बांटे जाने थे, जिनके किसी सदस्य ने मनरेगा के तहत 30 दिन या उससे अधिक रोजगार प्राप्त किया था।

इसके लिए शासन की ओर से खैरागढ़ जनपद पंचायत को कुल 15,220 टिफिन डिब्बे उपलब्ध कराए गए थे। इनमें से 9,360 टिफिन का वितरण कर दिया गया, लेकिन 5,860 टिफिन आज भी सरपंच सदन के गोदाम में पड़े हुए हैं।

अब वित्तीय वर्ष 2026-27 शुरू हो चुका है, लेकिन करीब एक दशक बाद भी हजारों पात्र हितग्राही योजना के लाभ से वंचित हैं।


सरपंचों के भवन में बना दिया गया गोदाम

सबसे हैरानी की बात यह है कि जिन टिफिनों का वितरण वर्षों पहले हो जाना चाहिए था, वे आज भी सरपंच सदन में रखे हुए हैं। यह भवन पंचायत प्रतिनिधियों की बैठकों, सरपंचों के ठहरने और जनपद संबंधी कार्यों के लिए बनाया गया था।

लेकिन लंबे समय से यहां टिफिन के डिब्बों का ढेर लगा हुआ है। स्थिति यह है कि सरपंचों के लिए बनाया गया भवन अब गोदाम में बदल गया है और पंचायत प्रतिनिधियों को बैठकों के दौरान परेशानी का सामना करना पड़ता है।


आचार संहिता के बाद अटक गया वितरण

जनपद पंचायत के रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2018 में विधानसभा चुनाव की आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण शेष टिफिनों का वितरण रोक दिया गया था।

इसके बाद मामले में कलेक्टर और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से मार्गदर्शन मांगा गया, लेकिन फाइलों में उलझा यह मामला वर्षों तक आगे नहीं बढ़ पाया। न तो टिफिनों का वितरण हुआ और न ही कोई अंतिम निर्णय लिया जा सका।


बदल गईं तीन सरकारें, लेकिन नहीं बदली स्थिति

इस दौरान प्रदेश में राजनीतिक बदलाव भी हुए। पहले भाजपा की सरकार रही, इसके बाद कांग्रेस सरकार का पूरा कार्यकाल बीत गया। वर्ष 2023 के अंत में भाजपा फिर सत्ता में लौटी, लेकिन करीब दो साल बाद भी हजारों टिफिन अपने वास्तविक हितग्राहियों तक नहीं पहुंच पाए हैं।

अब सवाल उठ रहा है कि सरकारें और अधिकारी बदलते रहे, लेकिन गरीब मजदूरों तक योजना का लाभ पहुंचाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी?


सरपंच संघ ने उठाया मामला

हाल ही में हुई सरपंच संघ की बैठक में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। सरपंचों ने मांग की है कि या तो पात्र हितग्राहियों को तत्काल टिफिन वितरित किए जाएं या फिर नियमानुसार उनका निपटारा कर सरपंच सदन को खाली कराया जाए।

उनका कहना है कि पंचायत प्रतिनिधियों के लिए बनाए गए भवन को वर्षों तक सरकारी सामग्री रखने के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं है।


रिकॉर्ड जांच के बाद देंगे जानकारी: CEO

जनपद पंचायत खैरागढ़ के सीईओ हिमांशु गुप्ता ने कहा कि यह मामला उनके कार्यकाल से पहले का है। पूरे रिकॉर्ड की जांच और संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेने के बाद ही इस संबंध में विस्तृत जानकारी दी जा सकेगी।


गरीबों के अधिकार पर सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि गरीब मजदूरों के लिए खरीदी गई सामग्री आखिर कब तक गोदाम में पड़ी रहेगी? यदि पात्र हितग्राहियों तक योजना का लाभ 10 साल बाद भी नहीं पहुंच पाया है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि गरीबों के अधिकारों की अनदेखी भी है।

जिला प्रशासन के सामने अब चुनौती सिर्फ टिफिन वितरण की नहीं, बल्कि इतने लंबे समय से लंबित मामले में जिम्मेदारी तय करने की भी है।