छत्तीसगढ़ में रक्षाबंधन का पर्व इस बार केवल भाई-बहन के रिश्ते का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और बदलाव की नई कहानी भी सामने ला रहा है। एक ओर कोरबा में स्व-सहायता समूह की महिलाएं धान, चावल और अन्य स्थानीय सामग्रियों से आकर्षक राखियां तैयार कर रही हैं, वहीं कांकेर जिले में आत्मसमर्पित नक्सली और पुनर्वासित परिवार राखी बनाकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
कभी हाथों में थी बंदूक, अब बना रहे राखी
कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर स्थित चौगेल नक्सल प्रभावित परिवार पुनर्वास केंद्र में एक अलग ही तस्वीर देखने को मिल रही है। यहां बिहान योजना के तहत आत्मसमर्पित नक्सलियों और पुनर्वासित परिवारों को राखी बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है। प्रशिक्षण के बाद अब तक 700 से अधिक राखियां तैयार की जा चुकी हैं।
राखी निर्माण का प्रशिक्षण संकुल संगठन केवटी की कमला तारम और पार्वती आंचले ने दिया। इस पहल का उद्देश्य पुनर्वासित लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ना है। तैयार राखियों के विपणन को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि यह हुनर उनके लिए आय का स्थायी जरिया बन सके।
धान-चावल से बनी राखियां बनीं आकर्षण
इधर कोरबा जिले की बेला कछार, दोनद्रो पंचायत का प्रसन्न स्व-सहायता समूह भी स्थानीय संसाधनों को रोजगार का माध्यम बना रहा है। वर्ष 2018 से बिहान से जुड़े इस समूह में 22 महिलाएं हैं। समूह की महिलाएं बाती, अगरबत्ती, कॉस्मेटिक सामग्री और कपड़ों से जुड़े कार्यों के साथ अब रक्षाबंधन के लिए खास राखियां तैयार कर रही हैं।
इन राखियों में धान, बर्रे भाजी, साबूदाना और चावल जैसी स्थानीय व प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया है। आकर्षक डिजाइन के साथ तैयार इन राखियों को लोगों से अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। समूह की नीतू कर्ष और मीरा देवांगन ने कलेक्टोरेट परिसर में स्टॉल लगाकर राखियों का प्रदर्शन किया। कलेक्टर कुणाल दुदावत ने भी राखियां खरीदकर महिलाओं के प्रयास की सराहना की।
मुख्यमंत्री के लिए भी तैयार की खास राखी
स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के लिए भी विशेष राखी तैयार की है। महिलाओं का कहना है कि सरकारी योजनाओं और आजीविका गतिविधियों से उन्हें अपने हुनर को आगे बढ़ाने और आर्थिक रूप से मजबूत होने का अवसर मिला है।
बस्तर और कोरबा से सामने आई ये तस्वीरें बदलाव का संदेश दे रही हैं। कहीं हिंसा का रास्ता छोड़ चुके लोग राखी के धागों से नई जिंदगी बुन रहे हैं, तो कहीं ग्रामीण महिलाएं धान और चावल जैसे स्थानीय संसाधनों को अपनी आमदनी और पहचान का जरिया बना रही हैं। रक्षाबंधन के मौके पर ये पहल शांति, आत्मनिर्भरता और स्थानीय हुनर की नई कहानी कह रही है।





