रायपुर। छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में लोगों तक कानूनी जानकारी उनकी स्थानीय भाषा में पहुंचाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल की संभावनाओं पर मंथन शुरू हो गया है। गोंड़ी, हल्बी समेत अन्य जनजातीय बोलियों में कानूनी नोटिस और जरूरी विधिक जानकारी का अनुवाद करने में AI की मदद लेने का सुझाव सामने आया है। इस पहल का उद्देश्य भाषा की बाधा को कम कर आदिवासी समुदायों के लिए न्याय तक पहुंच आसान बनाना है।

राजधानी रायपुर स्थित हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (HNLU) में ‘आदिवासी समुदायों के लिए न्याय तक पहुंच’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई।


आदिवासी क्षेत्रों में AI से कानूनी जागरूकता बढ़ाने पर जोर

कार्यशाला में न्यायपालिका, शिक्षाविदों, विधि विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और नागरिक समाज संगठनों से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हुए। चर्चा के दौरान आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों, वन अधिकार अधिनियम, ग्राम सभा की भूमिका और न्याय प्राप्त करने में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं पर विचार किया गया।

एचएनएलयू के कुलपति प्रो. विवेकानंदन ने आदिवासी क्षेत्रों में कानूनी जागरूकता बढ़ाने के लिए AI और लीगल हेल्थ क्लीनिक के इस्तेमाल का सुझाव दिया। खासतौर पर स्थानीय जनजातीय बोलियों में कानूनी सूचनाओं को उपलब्ध कराने से लोगों को अपने अधिकार और कानूनी प्रक्रिया समझने में मदद मिलने की संभावना जताई गई।


‘सस्ता, सुलभ और स्वच्छ न्याय जरूरी’

कार्यशाला के मुख्य अतिथि और उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अरविंद कुमार वर्मा ने कहा कि आदिवासी समुदायों के लिए न्याय तक पहुंच का अर्थ सस्ता, सुलभ और स्वच्छ न्याय होना चाहिए।

उन्होंने न्याय व्यवस्था को आदिवासी समुदायों की स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और जरूरतों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि न्याय व्यवस्था समुदाय-केंद्रित होगी तो दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को इसका वास्तविक लाभ मिल सकेगा।


जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों पर मंथन

राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन एचएनएलयू के सेंटर फॉर लॉ एंड इंडिजेनस पीपल और सेंटर फॉर कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ एंड फेडरलिज्म ने सीजी लर्न प्रोग्राम के तहत किया।

कार्यक्रम में जल-जंगल-जमीन से जुड़े अधिकारों के साथ आदिवासी समुदायों को मिले संवैधानिक संरक्षण और न्याय तक उनकी पहुंच की मौजूदा स्थिति पर चर्चा हुई। इस दौरान समावेश, जवाबदेही और परिवर्तनकारी न्याय से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर भी विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।


शोध पत्रिका ‘अरण्यका’ का विमोचन

कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समुदायों, कानून और उनसे जुड़े विषयों पर केंद्रित शोध पत्रिका ‘अरण्यका’ का भी विमोचन किया गया। कार्यशाला में इस बात पर जोर दिया गया कि तकनीक, कानूनी जागरूकता और स्थानीय भाषाओं के बेहतर इस्तेमाल से दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में न्याय व्यवस्था की पहुंच को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।