रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग में संयुक्त संचालक के पद पर कार्यरत क्रिस्टीना एस. लाल की सरकारी नौकरी पर संकट गहरा गया है। राज्य स्तरीय उच्च स्तरीय जाति जांच समिति ने उनके अनुसूचित जनजाति (एसटी) जाति प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। समिति ने जांच के बाद निष्कर्ष निकाला कि वे अपने अनुसूचित जनजाति होने के दावे को प्रमाणित नहीं कर सकीं।


लंबे समय से विवादों में था मामला

क्रिस्टीना एस. लाल के जाति प्रमाण पत्र को लेकर पिछले करीब एक दशक से विवाद चल रहा है। पहले भी उनके प्रमाण पत्र की वैधता पर सवाल उठे थे और जांच के बाद उसे अमान्य माना गया था। हालांकि, उस समय उन्होंने हाईकोर्ट से राहत प्राप्त कर ली थी। अदालत के निर्देश पर दोबारा उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया गया, जिसने विस्तृत जांच के बाद फिर से उनका एसटी प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया।


जांच समिति ने क्या पाया?

जांच समिति ने उपलब्ध दस्तावेजों, वंशावली, राजस्व अभिलेखों और अन्य साक्ष्यों की जांच की। इसके अलावा समिति ने संबंधित गांव में जाकर भी तथ्य जुटाए। जांच के दौरान ऐसा कोई पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला, जिससे उनके अनुसूचित जनजाति वर्ग से होने का दावा सही साबित हो सके। इसी आधार पर समिति ने उनका एसटी प्रमाण पत्र रद्द करने का आदेश जारी किया।


नौकरी पर पड़ सकता है असर

क्रिस्टीना एस. लाल ने सरकारी सेवा में नियुक्ति अनुसूचित जनजाति वर्ग के प्रमाण पत्र के आधार पर प्राप्त की थी। ऐसे में प्रमाण पत्र रद्द होने के बाद उनकी नियुक्ति की वैधता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। अब संबंधित विभाग समिति के आदेश का परीक्षण करेगा और नियमानुसार आगे की विभागीय कार्रवाई करेगा। यदि नियमों के तहत कार्रवाई होती है, तो उनकी नौकरी समाप्त होने के साथ-साथ सेवा संबंधी अन्य लाभ भी प्रभावित हो सकते हैं।


फर्जी जाति प्रमाण पत्र का मुद्दा फिर चर्चा में

इस फैसले के बाद फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी और आरक्षण का लाभ लेने के मामलों पर फिर बहस शुरू हो गई है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि ऐसे मामलों से वास्तविक अनुसूचित जनजाति वर्ग के पात्र उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित होते हैं। वहीं, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति ने गलत या फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी लाभ प्राप्त किया है, तो प्रमाण पत्र निरस्त होने के बाद उन लाभों को भी वापस लिया जा सकता है।


अन्य मामलों की भी हो सकती है समीक्षा

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, इस फैसले का असर केवल एक मामले तक सीमित नहीं रह सकता। राज्य में लंबित ऐसे अन्य मामलों की भी समीक्षा की जा सकती है, जिनमें जाति प्रमाण पत्र की वैधता को लेकर शिकायतें दर्ज हैं। फिलहाल संबंधित विभाग समिति के आदेश के आधार पर आगे की कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। यदि संबंधित पक्ष चाहे, तो कानून के तहत उपलब्ध न्यायिक विकल्पों का सहारा ले सकता है।