छत्तीसगढ़ को केवल सक्रिय नहीं, जवाबदेह शासन चाहिए
सार्वजनिक जीवन में कुछ सप्ताह ऐसे होते हैं, जब अलग-अलग दिखाई देने वाली खबरें मिलकर शासन की असली दिशा और दशा को सामने रख देती हैं। किसी विभाग में तबादले, मुख्यमंत्री निवास पर देर रात हुई समीक्षा बैठक, भूमि मुआवज़े पर उठे प्रश्न, विद्यालयों में बच्चों के पोषण से जुड़ी व्यवस्था, जेलों में योग कार्यक्रम और मादक पदार्थों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई — ये सब घटनाएं पहली नजर में अलग-अलग लग सकती हैं। लेकिन इन्हें साथ रखकर देखें, तो छत्तीसगढ़ के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती स्पष्ट दिखाई देती है: राज्य को अब केवल प्रशासनिक सक्रियता से आगे बढ़कर प्रशासनिक विश्वसनीयता स्थापित करनी होगी।
सरकार अपने कार्यकाल के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पड़ाव पर है। ढाई वर्ष पूरे करना केवल एक समयसीमा पूरी कर लेना नहीं है; यह शासन की गंभीरता की परीक्षा है। कोई भी सरकार योजनाओं की घोषणा कर सकती है, अधिकारियों के तबादले कर सकती है और समीक्षा बैठकों का आयोजन कर सकती है। लेकिन जनता शासन को बहुत सरल कसौटी पर परखती है — क्या अभिलेख सही हैं, क्या सेवाएं लोगों तक पहुंच रही हैं, क्या जनता का धन सुरक्षित है और क्या अधिकारी अपने कार्यों के लिए जवाबदेह हैं?
हाल ही में परिवहन विभाग के तबादला आदेश को लेकर उठे प्रश्न इसलिए किसी छोटी लिपिकीय भूल के रूप में नहीं देखे जा सकते। लोक प्रशासन में विवरण केवल औपचारिकता नहीं होते। यदि किसी अधिकारी की वर्तमान पदस्थापना को लेकर आदेश में भ्रम की स्थिति दिखाई देती है, तो यह एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है कि क्या विभाग अपने अभिलेखों को समय पर अद्यतन कर रहे हैं? क्या निर्णय लेने से पहले तथ्यों की उचित जांच की जाती है? परिवहन विभाग कोई दूर का या अमूर्त विभाग नहीं है। यह परमिट, सड़क सुरक्षा, कर, वाहन पंजीयन और नागरिकों तथा व्यवसायों की रोजमर्रा की आवाजाही से सीधा जुड़ा हुआ है। जो राज्य सुचारु शासन चाहता है, वह ऐसे विभागों में ढीले-ढाले कागजी काम को स्वीकार नहीं कर सकता।
यही बात भारतमाला परियोजना के अंतर्गत भूमि मुआवज़े से जुड़े आरोपों पर भी लागू होती है। जब किसान यह दावा करते हैं कि मुआवज़े को प्रभावित करने के लिए जमीन को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा गया, तो यह विषय किसी एक परियोजना या एक गांव तक सीमित नहीं रहता। आधारभूत संरचना का विकास जनता के विश्वास पर खड़ा होता है। सड़कें, गलियारे और औद्योगिक विस्तार संदेह की नींव पर नहीं बनाए जा सकते। यदि मुआवज़े की व्यवस्था भीतर के लोगों, बिचौलियों या चुनिंदा जानकारी के दुरुपयोग के प्रति असुरक्षित दिखाई देती है, तो भविष्य की हर बड़ी परियोजना विरोध और अविश्वास का सामना करेगी। राज्य को चाहिए कि वह निष्पक्ष, समयबद्ध जांच सुनिश्चित करे, वास्तविक भूमिधारकों की रक्षा करे और जहां विधि अनुमति दे, वहां मुआवज़े से जुड़े अभिलेखों को अधिक पारदर्शी बनाए।
फिर भी इस सप्ताह ने यह भी दिखाया कि जब शासन मूलभूत मानवीय जरूरतों पर ध्यान केंद्रित करता है, तो सरकारी कार्रवाई रचनात्मक भी हो सकती है। पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को केंद्रीय रसोई के माध्यम से पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने का निर्णय विद्यालयों में उपस्थिति, स्वास्थ्य और सीखने की क्षमता को बेहतर बनाने की संभावना रखता है। लेकिन इस व्यवस्था की सफलता गुणवत्ता नियंत्रण, स्थानीय निगरानी और जवाबदेही पर निर्भर करेगी। केंद्रीयकृत रसोई दक्षता ला सकती है, लेकिन वह केंद्रीयकृत लापरवाही में नहीं बदलनी चाहिए। भोजन की सुरक्षा, समय पर वितरण और पोषण मानकों की नियमित जांच आवश्यक है।
राज्य की सभी 33 जेलों में योग दिवस कार्यक्रम भी ध्यान देने योग्य हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि योग जेल सुधार की सभी गहरी समस्याओं का समाधान कर देगा, बल्कि इसलिए कि यह दंड व्यवस्था के भीतर सुधार और मानवीय दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है। जेलें निराशा के गोदाम नहीं होनी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य, अनुशासन, पुनर्वास और गरिमा न्याय व्यवस्था का हिस्सा होने चाहिए। योग अपने आप में संपूर्ण सुधार नहीं है, लेकिन यह उस व्यापक सुधार नीति का एक छोटा हिस्सा हो सकता है, जिसमें परामर्श, कौशल विकास और रिहाई के बाद पुनर्वास जैसी व्यवस्थाएं शामिल हों।
अंतरराज्यीय गांजा तस्करी से जुड़े एक आरोपी की गिरफ्तारी समन्वित पुलिस कार्रवाई के महत्व को दर्शाती है। छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति उसे अंतरराज्यीय अवैध व्यापार मार्गों के प्रति संवेदनशील बनाती है। पुलिस की सफलता केवल एक गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके बाद वित्तीय जांच, पूरे नेटवर्क की पहचान और ऐसा अभियोजन जरूरी है जो न्यायालय में टिक सके। गिरफ्तारियां सुर्खियां बनाती हैं, लेकिन दोषसिद्धि ही वास्तविक भय और रोकथाम पैदा करती है।
मुख्यमंत्री निवास पर देर रात हुई समीक्षा बैठक यह संकेत देती है कि सरकार इस समय की राजनीतिक और प्रशासनिक गंभीरता को समझती है। लेकिन समीक्षा बैठकें केवल बंद कमरों की कवायद नहीं रहनी चाहिए। नागरिक मापने योग्य परिणाम चाहते हैं। कौन-से विभाग समयसीमा से पीछे हैं? कौन-सी योजनाएं कमजोर पड़ रही हैं? किन जिलों में विशेष हस्तक्षेप की जरूरत है? किन अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है? जिस सरकार को अपने काम पर विश्वास है, उसे सार्वजनिक प्रगति-पटल, प्रदर्शन समीक्षा और स्पष्ट समयसीमा से डरना नहीं चाहिए।
इस सप्ताह का सबक स्पष्ट है। छत्तीसगढ़ में गतिविधि की कमी नहीं है। कमी कभी-कभी दिखाई देने वाली व्यवस्था, स्पष्टता और जवाबदेही की होती है। राज्य सक्रिय है, लेकिन सक्रियता को अनुशासन में बदलना होगा। फाइलों का मिलान तथ्यों से होना चाहिए। घोषणाएं धरातल पर पहुंचनी चाहिए। जांचें निष्कर्ष तक पहुंचनी चाहिए। तबादले पारदर्शी होने चाहिए। कल्याणकारी योजनाओं की निगरानी होनी चाहिए। पुलिस कार्रवाई केवल व्यक्तियों तक नहीं, पूरे नेटवर्क तक पहुंचनी चाहिए।
अच्छा शासन शोर से नहीं बनता। अच्छा शासन सटीकता, संस्थागत स्मृति और जवाबदेही से बनता है। छत्तीसगढ़ की जनता चमत्कार नहीं मांगती। वह भ्रष्टाचार से मुक्त सड़कें, पोषणयुक्त विद्यालय, अद्यतन अभिलेखों वाले विभाग, प्रभावी पुलिस व्यवस्था और तथ्य जानने वाले जनप्रतिनिधि चाहती है।





