जांजगीर-चांपा। नगर पंचायत नवागढ़ के राछाभाटा में जमीन को लेकर चल रहा विवाद अब तूल पकड़ता जा रहा है। ग्रीन कार्ड योजना के तहत मिली जमीन पर करीब 16 वर्षों से रहने का दावा करने वाली विमला कौशिक ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि उनके मामले में भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है। अपनी मांगों को लेकर विमला कौशिक ने भूख हड़ताल जारी रखी है।
नायब तहसीलदार ने पट्टे को बताया फर्जी
मामले में प्रशासन का पक्ष भी सामने आया है। मीडिया द्वारा जानकारी लिए जाने पर नवागढ़ के नायब तहसीलदार ने विमला कौशिक की ओर से प्रस्तुत किए जा रहे पट्टे को फर्जी बताया है। ऐसे में महिला और प्रशासन के अलग-अलग दावों के कारण जमीन से जुड़े दस्तावेजों की वैधता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
विमला कौशिक का कहना है कि वह लंबे समय से उक्त जमीन पर रह रही हैं और उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया जा रहा है। वहीं प्रशासन की ओर से पट्टे की वैधता पर ही सवाल उठाया गया है।
मकान के निर्माण वर्ष को लेकर भी विरोधाभास
इस विवाद में नगर पंचायत नवागढ़ के संपत्ति विवरण ने एक और सवाल खड़ा कर दिया है। नगर पंचायत की ओर से नरेंद्र चेलक के संबंध में जारी संपत्ति विवरण में मकान का निर्माण वर्ष 2014 दर्ज होने का दावा किया जा रहा है। दूसरी ओर, नायब तहसीलदार के अनुसार संबंधित मकान का निर्माण करीब तीन महीने पहले शुरू हुआ था।
दोनों जानकारियों में अंतर होने से यह सवाल उठ रहा है कि मकान वास्तव में कब बनाया गया और आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज निर्माण वर्ष का आधार क्या है।
पत्नी के नाम जमीन खरीदने का दावा
जानकारी के अनुसार, जिस जमीन पर नरेंद्र चेलक का मकान बना होने की बात कही जा रही है, वह जमीन उनकी पत्नी मीना के नाम से खरीदे जाने का दावा है। उपलब्ध बताए जा रहे दस्तावेजों में जमीन बेचने वाले का नाम संतोष, पिता मोहरसाय, निवासी नवागढ़ दर्ज बताया गया है। जमीन के लेन-देन के संबंध में स्टाम्प पर लिखित दस्तावेज और नोटरी कराए जाने का भी दावा किया जा रहा है।
सरकारी जमीन थी तो खरीद-बिक्री कैसे हुई?
मामले में सबसे बड़ा सवाल जमीन की प्रकृति को लेकर है। यदि संबंधित भूमि शासकीय है तो उसका कथित क्रय-विक्रय किन परिस्थितियों में हुआ? वहीं यदि लेन-देन से जुड़े दस्तावेज वैध हैं तो मकान के निर्माण वर्ष को लेकर प्रशासन और नगर पंचायत के रिकॉर्ड में अंतर क्यों दिखाई दे रहा है?
फिलहाल महिला और प्रशासन के दावे अलग-अलग हैं। ऐसे में दस्तावेजों की आधिकारिक जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। अब निगाह इस बात पर है कि शासन-प्रशासन पूरे मामले की जांच कर क्या कार्रवाई करता है।





