बस्तर की ‘घोटुल’ प्रथा: जहां युवक-युवतियां साथ रहकर समझते हैं जीवनसाथी चुनने का तरीका
छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ आदिवासी समुदायों की अनोखी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। यहां माड़िया और मुरिया जनजातियों में एक बेहद दिलचस्प सामाजिक परंपरा प्रचलित है, जिसे ‘घोटुल प्रथा’ कहा जाता है।
इस परंपरा में गांव के किनारे एक विशेष झोपड़ीनुमा स्थान ‘घोटुल’ बनाया जाता है, जो सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र होता है। यहीं पर समुदाय के युवक-युवतियों को एक-दूसरे के साथ समय बिताने, समझने और सामाजिक परंपराओं को जानने का अवसर मिलता है।
घोटुल में युवतियों को ‘मोतियारी’ और युवकों को ‘छेलिक’ कहा जाता है। यहां सभी गतिविधियां बड़े-बुजुर्गों की निगरानी में होती हैं, जो उन्हें संस्कृति, लोककला, गीत-संगीत और जीवन मूल्यों से परिचित कराते हैं।
घोटुल सिर्फ मेल-जोल का स्थान नहीं है, बल्कि यह युवाओं के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का भी माध्यम है। शाम के समय यहां ढोल-नगाड़ों की थाप पर पारंपरिक नृत्य और गीतों का माहौल बनता है, जिसमें पूरा समुदाय शामिल होता है।
कुछ क्षेत्रों में युवा रात घोटुल में ही बिताते हैं, जबकि कहीं-कहीं वे दिनभर साथ रहने के बाद अपने घर लौट जाते हैं। इस दौरान वे एक-दूसरे के स्वभाव, व्यवहार और सोच को करीब से समझते हैं।
जब युवक-युवती आपसी समझ और सहमति से एक-दूसरे को जीवनसाथी के रूप में चुन लेते हैं, तो वे अपने परिवार को इसकी जानकारी देते हैं, जिसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह संपन्न कराया जाता है।





