मुंबई। "यह देश सिर्फ दो मौकों पर एकजुट होकर खड़ा होता है—एक युद्ध के समय और दूसरा खेल के मैदान में। आपको लगता है कि हमने खेल खेला है, लेकिन हमने तो एक जंग लड़ी है।" फिल्म के नायक पेद्दी (राम चरण) का यह संवाद पूरी कहानी की आत्मा को बयां करता है।
फिल्म में पेद्दी केवल खेल के मैदान में जीत हासिल करने के लिए संघर्ष नहीं करता, बल्कि अपने गांव को नई पहचान दिलाने की लड़ाई भी लड़ता है। कहानी यह संदेश देने की कोशिश करती है कि भारत की असली ताकत और पहचान उसके गांवों में बसती है। इसलिए गांवों को छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने के बजाय उनके विकास पर ध्यान देना जरूरी है।
निर्देशक बुच्ची बाबू सना ने कहानी, स्क्रीनप्ले और संवादों के जरिए एक मजबूत सामाजिक संदेश देने का प्रयास किया है। फिल्म में क्रिकेट, कुश्ती और दौड़ जैसे तीन अलग-अलग खेलों को कहानी से जोड़कर गांव, संघर्ष और आत्मसम्मान की लड़ाई को दिखाया गया है।
हालांकि, फिल्म कई गंभीर विषयों जैसे गरीबों पर अत्याचार, ग्रामीणों के संघर्ष और सरकारी तंत्र की मनमानी को छूती है, लेकिन इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से एक सूत्र में पिरोने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाती। कुछ दृश्य और भावनात्मक पल दर्शकों को प्रभावित करते हैं, लेकिन कहानी कई जगह बिखरी हुई महसूस होती है।
कुल मिलाकर, फिल्म का उद्देश्य और संदेश सराहनीय है, लेकिन कमजोर पटकथा और असंतुलित प्रस्तुति के कारण यह दर्शकों पर उतना गहरा प्रभाव नहीं छोड़ पाती, जितनी इसकी संभावनाएं थीं।





