नई दिल्ली। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कहानी केवल युद्ध के मैदान और आंदोलनों तक सीमित नहीं रही। जेल की सलाखों के पीछे भी क्रांतिकारियों के विचार और शब्द अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष की आवाज बने। इन्हीं देशभक्ति रचनाओं में ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह गीत बाद में 1965 में आई मनोज कुमार की फिल्म ‘शहीद’ का हिस्सा बना और आज भी स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देशभक्ति की भावना जगाता है।
इस रचना को राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और उनके क्रांतिकारी साथियों से जोड़कर देखा जाता है। समय के साथ गीत के अलग-अलग रूप सामने आए और सिनेमा के जरिए इसे नई पीढ़ियों तक पहुंचने का मौका मिला।
जेल में तैयार हुई थी देशभक्ति से भरी रचना
प्रचलित विवरणों के मुताबिक, काकोरी कांड से जुड़े क्रांतिकारियों के जेल में रहने के दौरान बसंत के अवसर पर एक देशभक्ति रचना तैयार हुई। कहा जाता है कि एक साथी के आग्रह पर बसंत को लेकर लिखी गई पंक्तियों में बाद में दूसरे क्रांतिकारियों का भी योगदान रहा।
बसंती रंग को बलिदान, साहस और देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने की भावना से जोड़ते हुए यह रचना धीरे-धीरे क्रांतिकारियों के बीच लोकप्रिय होती चली गई।
‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ बना बलिदान का प्रतीक
गीत में बसंती चोले को मातृभूमि के लिए बलिदान की भावना से जोड़ा गया। समय के साथ इसके अलग-अलग संस्करणों में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई महान व्यक्तित्वों और घटनाओं के संदर्भ भी शामिल हुए।
यही वजह है कि यह गीत केवल एक संगीत रचना न रहकर क्रांतिकारी आंदोलन की स्मृतियों और देशभक्ति की भावना से जुड़ गया।
1931 में प्रकाशन से मिली और पहचान
बताया जाता है कि वर्ष 1931 में ‘साप्ताहिक अभ्युदय’ में इस रचना का एक स्वरूप ‘भगत सिंह का अंतिम गान’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। इसके बाद यह गीत भगत सिंह और उनके साथियों के बलिदान की स्मृतियों से भी गहराई से जुड़ता चला गया।
अलग-अलग दौर में इसके शब्दों और प्रस्तुति में बदलाव हुए, लेकिन देशभक्ति और बलिदान की मूल भावना बनी रही।
मनोज कुमार की ‘शहीद’ से घर-घर पहुंचा गीत
साल 1965 में रिलीज हुई फिल्म ‘शहीद’ ने इस गीत को व्यापक लोकप्रियता दिलाई। फिल्म में मनोज कुमार ने भगत सिंह की भूमिका निभाई थी।
फिल्म के लिए प्रेम धवन ने गीत को नया सिनेमाई रूप दिया। इसे उस दौर के दिग्गज गायकों की आवाज में प्रस्तुत किया गया और फिल्म की सफलता के साथ यह देश के सबसे लोकप्रिय देशभक्ति गीतों में शामिल हो गया।
दशकों बाद भी कायम है देशभक्ति का जज्बा
आज भी स्वतंत्रता दिवस और अन्य राष्ट्रीय पर्वों पर ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ की गूंज सुनाई देती है। स्कूलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और देशभक्ति आयोजनों में यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और बलिदान की याद दिलाता है।
समय बदल गया, पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन इस गीत से जुड़ी देशप्रेम और बलिदान की भावना आज भी लोगों के दिलों में जीवित है।





