सुकमा, 26 जून। सुकमा जिले में सरकारी धान खरीदी और उसके रखरखाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिला स्तर पर किए गए सत्यापन में बड़ी मात्रा में धान या तो रिकॉर्ड से कम पाया गया है या लंबे समय तक उठाव नहीं होने के कारण खराब हो गया है।
मिली जानकारी के अनुसार, सत्यापन के दौरान करीब 1,115.86 मीट्रिक टन धान रिकॉर्ड के मुकाबले कम पाया गया। वहीं लगभग 1,295.90 मीट्रिक टन धान करीब डेढ़ साल तक उठाव नहीं होने के कारण अमानक स्तर का हो गया। प्रभावित धान की कुल कीमत लगभग 2.68 करोड़ रुपये आंकी गई है।
यह मामला इसलिए और गंभीर माना जा रहा है क्योंकि यह धान किसानों से समर्थन मूल्य पर खरीदा गया था। खरीदी के बाद धान का समय पर उठाव, सुरक्षित भंडारण और मिलिंग के बाद सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत चावल के रूप में आपूर्ति की जानी थी।
प्रशासनिक स्तर पर परिवहन लक्ष्य पूरा होने की बात कही गई है, लेकिन सत्यापन रिपोर्ट ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यदि परिवहन लक्ष्य पूरा था, तो बचा हुआ धान लंबे समय तक खुले में कैसे पड़ा रहा और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी किसकी थी?
इस मामले ने निगरानी व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर किया है। धान खरीदी, भंडारण और परिवहन के लिए बनी व्यवस्था के बावजूद करोड़ों रुपये मूल्य का सरकारी धान या तो रिकॉर्ड के अनुसार उपलब्ध नहीं मिला या समय पर उठाव नहीं होने के कारण खराब हो गया।
अब यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही की कसौटी बन गया है। सवाल यह है कि सरकारी संपत्ति को हुए नुकसान के लिए जिम्मेदारी किस पर तय होगी और लापरवाही पाए जाने पर क्या कार्रवाई की जाएगी।
किसानों के लिए यह मामला केवल खराब हुए धान का नहीं है। यह उस खरीदी व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय है, जिसके भरोसे किसान अपनी उपज सरकार को बेचते हैं। समय पर खरीदी, सुरक्षित भंडारण और प्रभावी परिवहन इस व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।
अब जिला प्रशासन से अपेक्षा की जा रही है कि वह यह स्पष्ट करे कि इतनी बड़ी मात्रा में धान लंबे समय तक बिना उठाव के कैसे पड़ा रहा और नुकसान रोकने के लिए समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए गए।





