पटना। बिहार के नालंदा जिले के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने ग्लास्गो में पदक जीतकर देश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है। आर्थिक तंगी और कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए उन्होंने अपनी मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प के दम पर यह मुकाम हासिल किया। कभी परिवार का गुजारा चलाने के लिए ठेला लगाने और ई-रिक्शा चलाने वाले झंडू आज भारत का तिरंगा वैश्विक मंच पर लहरा चुके हैं।
गरीबी को नहीं बनने दिया बाधा
28 वर्षीय झंडू कुमार का जन्म बिहार के नालंदा जिले के एक गरीब परिवार में हुआ। उनके पिता रामानंद पासवान और मां कमला देवी सब्जी बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। बचपन से ही झंडू अपने माता-पिता का हाथ बंटाते थे और सब्जी की दुकान पर बैठकर उनकी मदद करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्होंने ठेला लगाने और ई-रिक्शा चलाकर भी घर की जिम्मेदारियां निभाईं।
चार साल की उम्र में पोलियो, फिर भी नहीं टूटा हौसला
महज चार वर्ष की उम्र में झंडू कुमार पोलियो से प्रभावित हो गए थे। शारीरिक चुनौती के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। समय के साथ उनकी रुचि पावरलिफ्टिंग में बढ़ी और उन्होंने इसी खेल में अपना भविष्य बनाने का फैसला किया। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने लगातार अभ्यास जारी रखा।
डाइट और प्रशिक्षण के लिए बेचना पड़ा ठेला और ई-रिक्शा
पावरलिफ्टिंग में बेहतर प्रदर्शन के लिए पौष्टिक आहार और नियमित प्रशिक्षण जरूरी था, लेकिन आर्थिक तंगी उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी। ऐसे में परिवार ने बड़ा त्याग करते हुए ठेला और ई-रिक्शा बेचने का फैसला किया। उसी पैसे से झंडू ने अपनी डाइट और प्रशिक्षण का खर्च पूरा किया। यही संघर्ष आज उनकी सफलता की सबसे बड़ी कहानी बन गया।
नाम के पीछे भी है दिलचस्प कहानी
झंडू कुमार के माता-पिता के अनुसार, उनका नाम किसी विशेष योजना के तहत नहीं रखा गया था। गांव में ऐसी मान्यता थी कि बच्चों को साधारण या अलग नाम देने से उन्हें बुरी नजर नहीं लगती। इसी विश्वास के चलते उनका नाम 'झंडू' रखा गया, जो आज उनकी पहचान बन चुका है।
सरकार से मिल रहा सहयोग
झंडू कुमार की उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 2024 से भारत सरकार उनके प्रशिक्षण और अन्य आवश्यक खर्च का वहन कर रही है। वहीं, बिहार सरकार ने भी समय-समय पर आर्थिक सहायता प्रदान की है।
कई सम्मान और अब सरकारी नौकरी की उम्मीद
झंडू के कोच कुंदन कुमार पांडेय के अनुसार, उन्हें अब तक तीन बार बिहार खेल सम्मान मिल चुका है। प्रत्येक सम्मान के साथ उन्हें प्रशस्ति पत्र और दो-दो लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि दी गई है।
अब झंडू कुमार के 20 लाख रुपये की उच्चस्तरीय खेल छात्रवृत्ति के लिए चयनित होने की संभावना है। इसके अलावा बिहार सरकार की 'पदक लाओ, नौकरी पाओ' योजना के तहत उन्हें लेवल-9 की सरकारी नौकरी मिलने की प्रक्रिया भी जारी है।
झंडू कुमार की कहानी इस बात का उदाहरण है कि कठिन परिस्थितियां और आर्थिक अभाव भी उस व्यक्ति का रास्ता नहीं रोक सकते, जिसके पास मेहनत, आत्मविश्वास और अपने लक्ष्य को हासिल करने का मजबूत संकल्प हो।





