बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सल प्रभाव कम होने के बाद वर्षों से विस्थापित आदिवासी परिवार अपने गांवों में लौटकर सामान्य जीवन शुरू कर रहे हैं। इसी बीच वन विभाग द्वारा कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। हालात को लेकर पुलिस मुख्यालय ने वन विभाग को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि इस तरह की कार्रवाई से ग्रामीणों में असंतोष बढ़ सकता है और कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित होने की आशंका है।
पुलिस मुख्यालय में एडीजी (नक्सल) की ओर से भेजे गए पत्र में कहा गया है कि बीजापुर और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में आदिवासी परिवार वर्षों बाद अपने गांव लौटे हैं। ऐसे समय में वन भूमि पर अतिक्रमण का हवाला देकर खेतों, झोपड़ियों और अन्य निर्माणों पर कार्रवाई किए जाने से ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ रही है। पत्र में इस स्थिति को गंभीर बताते हुए समय रहते समाधान निकालने की आवश्यकता जताई गई है।
दूसरी ओर, वन विभाग का कहना है कि आरक्षित वन क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण नियमों के विरुद्ध है और विभाग कानून के अनुसार कार्रवाई कर रहा है। हालांकि, सवाल यह भी उठ रहे हैं कि वर्षों तक नक्सली हिंसा के कारण गांव छोड़ने वाले परिवारों के पुनर्वास और आजीविका की व्यवस्था कैसे सुनिश्चित की जाए।
पुलिस मुख्यालय की आपत्ति के बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) ने 1 जुलाई को मुख्य वन संरक्षक, जगदलपुर से पूरे मामले की तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वन विभाग की कार्रवाई, उससे उत्पन्न परिस्थितियों और मौजूदा स्थिति की विस्तृत जानकारी सात दिनों के भीतर उपलब्ध कराई जाए।
इस घटनाक्रम ने बस्तर में पुनर्वास नीति और वन संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। माना जा रहा है कि रिपोर्ट मिलने के बाद राज्य सरकार पूरे मामले की समीक्षा करेगी और आगे की रणनीति तय करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जंगल संरक्षण के साथ आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों और पुनर्वास के बीच संतुलित समाधान निकालना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी।





