रायपुर। देश में विकास परियोजनाओं के लिए वनभूमि को गैर-वानिकी उपयोग में लेने का सिलसिला लगातार जारी है। केंद्र सरकार से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच देशभर में 2,15,943 हेक्टेयर से अधिक वनभूमि को गैर-वानिकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करने की मंजूरी दी गई है।
इन आंकड़ों में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 2025-26 में मध्यप्रदेश में वनभूमि डायवर्जन पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले 116 प्रतिशत बढ़ा, जबकि छत्तीसगढ़ में 94 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
खनन, सड़क, रेल, ऊर्जा, सिंचाई और दूसरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वनभूमि की बढ़ती जरूरत के बीच पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन को लेकर चर्चा तेज हो सकती है।
12 वर्षों में 2.15 लाख हेक्टेयर से ज्यादा वनभूमि को मंजूरी
रिपोर्ट में दिए गए केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच देश में कुल 2,15,943 हेक्टेयर वनभूमि को गैर-वानिकी उपयोग के लिए मंजूरी दी गई।
इसमें करीब 62 प्रतिशत भूमि खनन, जलविद्युत, सिंचाई और सड़क जैसी परियोजनाओं से संबंधित बताई गई है।
सबसे अहम बात यह है कि पिछले दो वित्तीय वर्षों में ही 45,124.64 हेक्टेयर वनभूमि के डायवर्जन को मंजूरी दी गई।
2025-26 में देशभर में 26,858 हेक्टेयर वनभूमि डायवर्ट
वित्तीय वर्ष 2025-26 में देशभर में करीब 26,858 हेक्टेयर वनभूमि को गैर-वानिकी गतिविधियों के लिए मंजूरी मिली।
यह आंकड़ा 2024-25 की तुलना में करीब 47 प्रतिशत अधिक बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह पिछले 12 वर्षों में किसी एक वित्तीय वर्ष में दर्ज सबसे अधिक स्तर है।
2024-25 और 2025-26 के आंकड़ों को देखें तो इन दो वर्षों में औसतन हर साल करीब 22,562 हेक्टेयर वनभूमि गैर-वानिकी उपयोग के लिए मंजूर हुई। यानी औसतन प्रतिदिन करीब 61 हेक्टेयर वनभूमि के बराबर क्षेत्र।
छत्तीसगढ़ में चार साल में 4,092 हेक्टेयर वनभूमि का डायवर्जन
छत्तीसगढ़ के आंकड़े भी ध्यान खींचने वाले हैं। 1 अप्रैल 2021 से 31 मार्च 2025 के बीच प्रदेश में करीब 4,092.01 हेक्टेयर वनभूमि को गैर-वन उपयोग के लिए मंजूरी दी गई।
इसके बाद वर्ष 2025-26 में प्रदेश में वनभूमि डायवर्जन की रफ्तार पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 94 प्रतिशत बढ़ने की बात सामने आई है।
छत्तीसगढ़ का बड़ा भू-भाग वन क्षेत्र में आता है। साथ ही प्रदेश कोयला और अन्य खनिज संसाधनों से समृद्ध है। ऐसे में खनन के अलावा सड़क, रेल और बिजली परियोजनाओं के लिए भी वनभूमि की जरूरत पड़ती है।
मध्यप्रदेश में चार साल में 17,393 हेक्टेयर से अधिक वनभूमि डायवर्ट
मध्यप्रदेश में वनभूमि डायवर्जन का आंकड़ा छत्तीसगढ़ की तुलना में काफी अधिक रहा है।
केंद्र सरकार द्वारा राज्यसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, अप्रैल 2021 से मार्च 2025 तक मध्यप्रदेश में 17,393.65 हेक्टेयर वनभूमि को गैर-वानिकी उपयोग के लिए मंजूरी दी गई।
इस अवधि में मध्यप्रदेश देश में सबसे अधिक वनभूमि डायवर्जन वाले राज्यों में शीर्ष पर रहा। चार साल में मध्यप्रदेश का आंकड़ा छत्तीसगढ़ की तुलना में करीब 4.25 गुना रहा।
इसके बाद 2025-26 में मध्यप्रदेश में वनभूमि डायवर्जन में पिछले साल की तुलना में 116 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
चार राज्यों की हिस्सेदारी 57 प्रतिशत से अधिक
वर्ष 2025-26 के आंकड़ों में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ अरुणाचल प्रदेश और झारखंड भी प्रमुख राज्यों में शामिल रहे।
रिपोर्ट के अनुसार, इन चार राज्यों की हिस्सेदारी देश में वर्ष 2025-26 के दौरान मंजूर कुल वनभूमि डायवर्जन में 57 प्रतिशत से अधिक रही।
यह आंकड़ा बताता है कि देश में वनभूमि के गैर-वानिकी उपयोग का बड़ा हिस्सा कुछ वन और खनिज संपन्न राज्यों में केंद्रित है।
खनन और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं से बढ़ रहा दबाव
छत्तीसगढ़ में कोयला सहित कई महत्वपूर्ण खनिज संसाधन मौजूद हैं। इनके दोहन के लिए खनन परियोजनाओं के अलावा परिवहन, सड़क, रेलवे और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे की भी जरूरत होती है।
ऐसी परियोजनाओं में कई बार वनभूमि के उपयोग की आवश्यकता सामने आती है। हालांकि, वनभूमि के डायवर्जन के साथ पर्यावरणीय स्वीकृति, प्रतिपूरक वनीकरण और अन्य निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन भी जरूरी होता है।
विकास और वन संरक्षण के बीच संतुलन बड़ी चुनौती
तेजी से बढ़ती सड़क, रेल, खनन, ऊर्जा और दूसरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के बीच वन क्षेत्रों की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।
विशेष रूप से छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे बड़े वन क्षेत्र वाले राज्यों में विकास परियोजनाओं के साथ जंगल, वन्यजीव और स्थानीय समुदायों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना अहम है।
आने वाले वर्षों में यह महत्वपूर्ण होगा कि विकास परियोजनाओं के लिए वनभूमि के इस्तेमाल के साथ प्रतिपूरक वनीकरण, पर्यावरणीय सुरक्षा और वन संरक्षण से जुड़े नियमों को कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है।





