यह तस्वीर बस्तर की प्रसिद्ध 'चापड़ा चटनी' की पारंपरिक और अनोखी दुनिया को दर्शाती है। चित्र में एक आदिवासी महिला स्थानीय हाट-बाजार में सिल-बट्टे पर लाल बुनकर चींटियों (चापड़ा) को हरी मिर्च, लहसुन और देसी मसालों के साथ पीसकर चटनी तैयार करती नजर आ रही है। सिल-बट्टे पर पिसती लाल चींटियां और उनके साथ मिलाए जा रहे मसाले इस पारंपरिक व्यंजन की विशेषता को जीवंत रूप से प्रदर्शित करते हैं।

महिला के पास रखे मिट्टी के बर्तनों में ताजा लाल चींटियां और तैयार नारंगी-लाल रंग की चापड़ा चटनी दिखाई दे रही है, जिसे पत्तों से बने दोने में परोसा गया है। आसपास मौजूद स्थानीय लोग और पर्यटक इस अनोखी प्रक्रिया को उत्सुकता से देखते नजर आ रहे हैं।

पृष्ठभूमि में लगे बोर्ड पर हिंदी में लिखा है— "बस्तर की प्रसिद्ध चापड़ा चटनी – रेंगने वाला स्वाद" तथा "साल और महुआ के पेड़ों से थाली तक – प्रकृति का वैज्ञानिक आहार"। यह संदेश न केवल बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति को दर्शाता है, बल्कि इस पारंपरिक खाद्य पदार्थ के पोषण और वैज्ञानिक महत्व को भी उजागर करता है।

चापड़ा चटनी बस्तर की पहचान मानी जाती है। खट्टे और तीखे स्वाद वाली यह चटनी लाल बुनकर चींटियों और उनके अंडों से बनाई जाती है तथा स्थानीय समुदायों के बीच लंबे समय से पारंपरिक भोजन का हिस्सा रही है।