बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की अदालतों और पुलिस थानों में इस्तेमाल होने वाली भाषा में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बाद न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील, सम्मानजनक और पीड़ित-केंद्रित बनाने की पहल की गई है। अब अदालती फैसलों, एफआईआर और चार्जशीट में महिलाओं के चरित्र, पहनावे या निजी जीवन को लेकर रूढ़िवादी और अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल से बचने के निर्देश दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘Judgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments’ के जरिए न्यायिक भाषा में लैंगिक रूढ़ियों से बचने और संवेदनशील शब्दावली अपनाने पर जोर दिया है। इसके बाद छत्तीसगढ़ में संबंधित न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं को दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है।
24 जिला अदालतों समेत संबंधित विभागों को निर्देश
जानकारी के मुताबिक, प्रदेश के सभी 24 जिला एवं सत्र न्यायालयों, छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी, राज्य एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के साथ ही मुख्य सचिव, गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक और महिला एवं बाल विकास विभाग तक दिशा-निर्देश पहुंचाए गए हैं।
इसके तहत ‘चरित्रहीन’, ‘रखैल’ जैसे महिला के चरित्र पर टिप्पणी करने वाले शब्दों और अन्य अपमानजनक या रूढ़िवादी अभिव्यक्तियों से बचने पर जोर दिया गया है। ‘Prostitute’ जैसे शब्द के स्थान पर सामान्य परिस्थितियों में ‘Sex Worker’ जैसे सम्मानजनक शब्द के इस्तेमाल की अनुशंसा की गई है। हालांकि, जहां किसी कानून की वैधानिक भाषा में किसी विशेष शब्द का उल्लेख जरूरी हो, वहां उसका प्रयोग किया जा सकता है।
FIR और चार्जशीट में भी बदलेगी भाषा
पुलिस को भी एफआईआर और चार्जशीट तैयार करते समय महिलाओं के पहनावे, व्यवहार, चाल-चलन या चरित्र के आधार पर टिप्पणी करने वाले शब्दों से बचने को कहा गया है। कोशिश यह है कि जांच और कानूनी दस्तावेजों में केवल मामले से जुड़े तथ्यों और साक्ष्यों को महत्व दिया जाए।
गवाहों के लिए सम्मानजनक व्यवस्था
दिशा-निर्देशों में अदालत आने वाले पीड़ितों और गवाहों के साथ सम्मानजनक व्यवहार पर भी जोर दिया गया है। उन्हें लंबे समय तक अनावश्यक इंतजार न कराने तथा बैठने, पानी और उचित माहौल जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कही गई है।
संवेदनशील मामलों की बंद कमरे में सुनवाई
यौन अपराध और पॉक्सो से जुड़े मामलों में पीड़ित की निजता और पहचान की सुरक्षा को प्राथमिकता देने के निर्देश हैं। जरूरत के अनुसार ऐसे मामलों की सुनवाई इन-कैमरा यानी बंद कमरे में की जाएगी और पीड़ित की पहचान गोपनीय रखने के नियमों का सख्ती से पालन किया जाएगा।
न्यायिक और पुलिस अधिकारियों को मिलेगी ट्रेनिंग
छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी के माध्यम से न्यायिक अधिकारियों, सरकारी वकीलों और संबंधित पुलिस अधिकारियों के लिए संवेदनशीलता तथा ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित करने पर भी जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में लैंगिक पूर्वाग्रह और रूढ़िवादी सोच को कम करना है।
यौन उत्पीड़न और एसिड अटैक से प्रभावित लोगों को NALSA Victim Compensation Scheme, 2018 के तहत जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के जरिए पात्रता के अनुसार अंतरिम राहत और पुनर्वास सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की इस पहल का मुख्य उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में ऐसी भाषा को बढ़ावा देना है, जो किसी पीड़ित की गरिमा को ठेस न पहुंचाए और न्याय व्यवस्था को अधिक संवेदनशील, निष्पक्ष तथा मानवीय बनाए।





