नई दिल्ली। डिजिटल युग में सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम रील्स, ओटीटी प्लेटफॉर्म और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) युवाओं की सोच और व्यवहार को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में युवाओं के मानसिक, नैतिक और सामाजिक विकास को लेकर शिक्षाविदों ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि आधुनिक तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं है, बल्कि युवाओं को उसका जिम्मेदार और रचनात्मक उपयोग सिखाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
यह विचार दैनिक जागरण के ओखला कार्यालय में आयोजित 'रजनीगंधा प्रेजेंट्स जागरण फिल्म फेस्टिवल' के तहत "युवा मन की रचना किसके हाथ" विषय पर आयोजित विशेष परिचर्चा में सामने आए।
तकनीक नहीं, उसके सही उपयोग पर हो जोर
परिचर्चा में विशेषज्ञों ने कहा कि डिजिटल क्रांति ने जानकारी तक पहुंच को बेहद आसान बना दिया है, लेकिन इसके साथ ही सही और गलत जानकारी की पहचान करना युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। सोशल मीडिया एल्गोरिदम और एआई आधारित कंटेंट युवाओं की सोच को प्रभावित कर रहे हैं, इसलिए उन्हें डिजिटल साक्षरता और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है।
परिवार और शिक्षकों की भूमिका सबसे अहम
शिक्षाविदों का मानना है कि युवाओं के मानसिक और नैतिक विकास की जिम्मेदारी केवल तकनीक या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नहीं छोड़ी जा सकती। परिवार, शिक्षक और समाज को मिलकर ऐसी सकारात्मक सीख और वातावरण देना होगा, जिससे युवाओं में नैतिक मूल्य, अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना विकसित हो सके।
क्रिटिकल थिंकिंग की जरूरत पर जोर
विशेषज्ञों ने कहा कि आज के दौर में केवल जानकारी हासिल करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके विश्लेषण और सत्यता की परख करना भी उतना ही जरूरी है। इसके लिए युवाओं में क्रिटिकल थिंकिंग (तार्किक सोच), तथ्य जांचने की क्षमता और जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार विकसित करना समय की मांग है।
संतुलित डिजिटल उपयोग ही समाधान
परिचर्चा में यह निष्कर्ष निकला कि रील्स, ओटीटी और एआई जैसी आधुनिक तकनीकों का विरोध नहीं किया जा सकता, लेकिन इनके संतुलित और सकारात्मक उपयोग के लिए जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। विशेषज्ञों ने कहा कि यदि तकनीक का सही दिशा में उपयोग किया जाए तो यह युवाओं के ज्ञान, कौशल और रचनात्मकता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है।





