अंबिकापुर, 30 जून। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन को लेकर जारी विवाद और राजनीतिक बहस के बीच मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि लोगों को यह भ्रम दूर कर लेना चाहिए कि कोयला खनन और विकास कार्यों से केवल पर्यावरण को ही नुकसान होता है। राज्य सरकार विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ रही है और दोनों पहलुओं को समान महत्व दिया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों और घने वनों से समृद्ध राज्य है। प्रदेश का करीब 44 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र से आच्छादित है, जो देश के सबसे बड़े वन क्षेत्रों में शामिल है। सरकार लगातार वन संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है।

कैम्पा योजना से लगातार बढ़ रहा हरित क्षेत्र

मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य में वर्षों से कैम्पा (CAMPA) योजना के तहत बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जा रहा है। वन विभाग द्वारा खाली भूमि पर लाखों पौधे लगाए गए हैं, जिससे वन क्षेत्र का विस्तार लगातार हो रहा है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण सरकार की प्राथमिकता है और इसके लिए दीर्घकालिक योजनाओं पर काम किया जा रहा है।

उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर चलाए जा रहे 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान को प्रदेश में व्यापक जनसहभागिता मिल रही है। कैम्पा योजना और इस अभियान के संयुक्त प्रयासों से राज्य के लगभग 2.5 प्रतिशत अतिरिक्त क्षेत्र को हरित आवरण में शामिल किया जा चुका है।

उद्योगों के लिए सख्त पर्यावरणीय नियम

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि राज्य की औद्योगिक नीति में पर्यावरण संरक्षण के कड़े प्रावधान लागू हैं। यदि किसी उद्योग या विकास परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई की जाती है, तो संबंधित संस्था को निर्धारित नियमों के तहत उससे कई गुना अधिक पौधे लगाने और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी निभानी होती है।

उन्होंने कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करती है कि विकास परियोजनाओं के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहे और भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सके।

विकास कार्यों में कभी-कभी जरूरी होती है पेड़ों की कटाई

मुख्यमंत्री ने कहा कि कई बार जनहित और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए पेड़ों की कटाई अपरिहार्य हो जाती है। उन्होंने नेशनल हाईवे-43 के चौड़ीकरण का उदाहरण देते हुए कहा कि सड़क, पुल और अन्य आधारभूत परियोजनाओं के निर्माण के लिए भूमि की आवश्यकता होती है।

उन्होंने कहा, "सड़कें आसमान में नहीं बन सकतीं। यदि लोगों को बेहतर सड़क, परिवहन और विकास चाहिए तो कुछ स्थानों पर पेड़ों की कटाई करनी पड़ती है। हालांकि इसके बदले बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण भी किया जाता है।"

तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए बहस

मुख्यमंत्री ने हसदेव अरण्य में कोयला खनन का विरोध कर रहे लोगों और विभिन्न संगठनों का नाम लिए बिना कहा कि किसी भी विषय पर टिप्पणी करने से पहले राज्य की औद्योगिक नीति, पर्यावरणीय नियमों और विकास की जरूरतों को समझना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि अधूरी जानकारी या केवल आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है। विकास और पर्यावरण दोनों राज्य की प्राथमिकताएं हैं और सरकार इनके बीच संतुलन बनाकर कार्य कर रही है।

हसदेव को लेकर लंबे समय से जारी है बहस

गौरतलब है कि हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन को लेकर पिछले कई वर्षों से पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों, आदिवासी समुदायों और राजनीतिक दलों के बीच लगातार बहस चल रही है। एक पक्ष जहां जंगलों और जैव विविधता के संरक्षण की मांग कर रहा है, वहीं सरकार और उद्योग जगत ऊर्जा सुरक्षा, रोजगार और औद्योगिक विकास के लिए खनन परियोजनाओं को आवश्यक बता रहे हैं।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का यह बयान ऐसे समय में आया है जब हसदेव में कोयला खनन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर प्रदेश की राजनीति और जनचर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।