बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उच्च पद का प्रभार दिए जाने से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ वरिष्ठ होने के आधार पर कोई कर्मचारी उच्च पद का प्रभार पाने का अधिकार नहीं जता सकता। प्रभार सौंपते समय वरिष्ठता के साथ अधिकारी की कार्यकुशलता, योग्यता और प्रशासनिक जरूरतों को भी ध्यान में रखा जा सकता है।

न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की एकलपीठ ने गरियाबंद में प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के पद पर एक कनिष्ठ अधिकारी को जिम्मेदारी दिए जाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

BEO ने हाईकोर्ट में दी थी आदेश को चुनौती

मामला ब्लॉक शिक्षा अधिकारी किशन लाल मटवाले की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता वर्ष 1995 से स्कूल शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं और वर्तमान में छुरा में बीईओ के पद पर पदस्थ हैं।

उन्होंने राज्य शासन के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके तहत उनसे कनिष्ठ अधिकारी राजेश चंद्राकर को गरियाबंद जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभार दिया गया था।

याचिकाकर्ता ने वरिष्ठता को बनाया आधार

याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में कहा गया कि छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा भर्ती एवं पदोन्नति नियम-2026 के तहत वे पदोन्नति और उच्च पद का प्रभार संभालने के लिए पात्र हैं।

उनका तर्क था कि वरिष्ठ होने के बावजूद कनिष्ठ अधिकारी को डीईओ का प्रभार देना प्रशासनिक निर्देशों के विपरीत है और इससे उनके अधिकारों की अनदेखी हुई है।

सरकार ने कोर्ट में पेश किया कलेक्टर का पत्र

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया। सरकार की ओर से गरियाबंद कलेक्टर का एक शासकीय पत्र भी कोर्ट के सामने रखा गया।

इस पत्र में याचिकाकर्ता पर शासकीय कार्यों में गंभीर लापरवाही और नियमों की अनदेखी के आरोपों का उल्लेख था। कलेक्टर ने उनके आचरण को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम-1965 के विपरीत बताते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई और निलंबन की सिफारिश की थी।

राज्य शासन ने दलील दी कि किसी उच्च पद का प्रभार देना स्थायी पदोन्नति नहीं, बल्कि एक अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था है। अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल प्रशासनिक टिप्पणियां होने की स्थिति में उसे उच्च पद की जिम्मेदारी देना आवश्यक नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा- वरिष्ठता अकेला आधार नहीं

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई वैधानिक नियम या प्रावधान नहीं बता सके, जिससे यह साबित हो कि केवल वरिष्ठता के आधार पर उच्च पद का प्रभार मिलना उनका कानूनी अधिकार है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठता को अधिकारी की उपयुक्तता से ऊपर नहीं रखा जा सकता। किसी उच्च पद की जिम्मेदारी सौंपते समय सक्षम अधिकारी उसकी दक्षता, अनुभव, कार्यप्रणाली और प्रशासनिक आवश्यकताओं का आकलन कर सकता है।

प्रशासनिक फैसलों में सीमित होगा न्यायिक हस्तक्षेप

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी को उच्च पद का प्रभार देना एक अस्थायी यानी स्टॉपगैप प्रशासनिक व्यवस्था है।

अदालत ऐसे प्रशासनिक निर्णयों में तभी हस्तक्षेप कर सकती है, जब उसमें किसी वैधानिक नियम का उल्लंघन, दुर्भावना या स्पष्ट मनमानी साबित हो।

मौजूदा मामले में ऐसी कोई अवैधता नहीं मिलने पर हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका को खारिज कर दिया।