कसडोल। देवपुर वन परिक्षेत्र में शनिवार को प्रकृति और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय की अनूठी झलक देखने को मिली। यहां औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण, पहचान और वैज्ञानिक वर्गीकरण पर केंद्रित एक दिवसीय ‘बॉटनाइजेशन’ कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य जंगलों में उपलब्ध औषधीय संपदा की पहचान कर उसे संरक्षित करना तथा पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक आधार से जोड़ना रहा।
कार्यशाला में पारंपरिक वैद्य, वन विभाग के अधिकारी, वन प्रबंधन समिति के सदस्य, बारनवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य के गाइड्स तथा स्थानीय विद्यालयों के छात्र-छात्राएं शामिल हुए।
80 औषधीय वनस्पतियों की हुई पहचान
विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में वन क्षेत्र का भ्रमण कर लगभग 80 प्रकार की वनस्पति प्रजातियों की लाइव पहचान की गई। इनमें अर्जुन, आंवला, बहेड़ा, बेल, काली मुसली, हाथीपांव, दूधी, भुईनीम, सतावर, खरहर, ठेलका, नरनारी तथा दुर्लभ गरुड़ जैसी महत्वपूर्ण औषधीय जड़ी-बूटियां शामिल रहीं।
डॉक्टरों और वनस्पतिशास्त्रियों ने इन पौधों के औषधीय गुणों, पर्यावरणीय महत्व, उनके संरक्षण की आवश्यकता तथा विभिन्न रोगों के उपचार में उनके उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी। साथ ही लुप्तप्राय होती प्रजातियों पर चिंता जताते हुए इनके संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया गया।





