बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि भर्ती विज्ञापन में किसी विशेष प्रकार की दिव्यांगता को अयोग्य घोषित नहीं किया गया है, तो चयन प्रक्रिया पूरी होने और नियुक्ति के बाद सरकार किसी प्रशासनिक समिति की रिपोर्ट के आधार पर कर्मचारी की सेवा समाप्त नहीं कर सकती।
जस्टिस एन.के. चंद्रवंशी की एकलपीठ ने यह फैसला शारीरिक शिक्षा शिक्षक (पीटीआई) के पद पर कार्यरत दो दृष्टिबाधित शिक्षकों के पक्ष में सुनाया। कोर्ट ने राज्य सरकार की कार्रवाई को मनमाना और नियमों के विपरीत बताते हुए बर्खास्तगी संबंधी आदेश और नोटिस दोनों को निरस्त कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
संचालनालय लोक शिक्षण, रायपुर ने 9 मार्च 2019 को व्याख्याता, शिक्षक और सहायक शिक्षक के पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। भर्ती प्रक्रिया में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत आरक्षण का प्रावधान रखा गया था, लेकिन विज्ञापन में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि किन श्रेणियों के दिव्यांग अभ्यर्थी आवेदन के लिए अपात्र होंगे।
इसी भर्ती प्रक्रिया के तहत 40 प्रतिशत दृष्टिबाधित अभ्यर्थी शिव शंकर साहू और नील कुमारी ने शारीरिक शिक्षा शिक्षक (पीटीआई) के पद के लिए आवेदन किया। दोनों ने चयन प्रक्रिया, दस्तावेज सत्यापन और अन्य सभी औपचारिकताएं सफलतापूर्वक पूरी कीं, जिसके बाद 24 अगस्त 2021 को उनकी नियुक्ति कर दी गई। नियुक्ति के बाद दोनों नियमित रूप से अपनी सेवाएं दे रहे थे।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब भर्ती विज्ञापन में किसी विशेष दिव्यांगता को अयोग्य नहीं माना गया और अभ्यर्थियों का चयन नियमानुसार हुआ, तो बाद में किसी समिति की रिपोर्ट का हवाला देकर उनकी नियुक्ति रद्द करना न्यायसंगत नहीं है।
अदालत ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई न केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि चयनित कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन करती है। इसलिए सरकार द्वारा जारी बर्खास्तगी आदेश और नोटिस को रद्द किया जाता है।




