दिल्ली में चुनाव आयोग और मतदाता सूची पुनरीक्षण के खिलाफ प्रदर्शन से जुड़े मामले में सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर सुनवाई, हाईकोर्ट ने वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की दी अहम नसीहत
नई दिल्ली। दिल्ली में मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनाव आयोग के विरोध में हुए प्रदर्शनों से जुड़े मामले में हिरासत में लिए गए सीजेपी नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली हाईकोर्ट से फिलहाल राहत नहीं मिल सकी। स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) की ओर से हिरासत की अवधि बढ़ाए जाने के आदेश को चुनौती देने पहुंचे दोनों याचिकाकर्ताओं ने अदालत की कड़ी टिप्पणियों के बाद अपनी याचिका वापस ले ली। हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि जब कानून में अपील का विकल्प पहले से उपलब्ध है, तो सीधे उच्च न्यायालय का रुख क्यों किया गया।
हिरासत बढ़ाने के आदेश के खिलाफ पहुंचे थे हाईकोर्ट
जानकारी के अनुसार, सौरव दास और आशुतोष रांका ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा 14 और 19 अक्टूबर को पारित आदेशों को चुनौती दी थी। इन आदेशों के तहत उनकी हिरासत की अवधि बढ़ाई गई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि मजिस्ट्रेट के आदेश उचित नहीं हैं और उन्हें अनावश्यक रूप से हिरासत में रखा जा रहा है। हालांकि, सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सबसे पहले याचिका दायर करने की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए।
हाईकोर्ट ने पूछा- अपील का रास्ता खुला है तो सीधे यहां क्यों आए?
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता अभिक चिमनी से पूछा कि जब संबंधित आदेशों के खिलाफ सक्षम अपीलीय अदालत में जाने का विकल्प मौजूद है, तो सीधे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मिलने वाले अधिकारों का इस्तेमाल सामान्य अपील के विकल्प के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि जहां कानून में विवाद के समाधान की निर्धारित प्रक्रिया उपलब्ध है, वहां पहले उसका पालन किया जाना उचित है।
दोपहर में सुनवाई तय थी, फिर सुबह हाईकोर्ट पहुंचने पर सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ताओं की जल्दबाजी पर भी सवाल उठाए। हाईकोर्ट के संज्ञान में लाया गया कि उसी दिन दोपहर दो बजे स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत में मामले की सुनवाई निर्धारित थी।
इस पर पीठ ने पूछा कि जब निचली अदालत में जमानतदारों के सत्यापन और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं पर विचार होना था, तो उस सुनवाई का इंतजार क्यों नहीं किया गया।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को पहले संबंधित न्यायिक मंच पर अपनी बात रखने की प्रक्रिया अपनाने का सुझाव दिया।
चार बार जमानतदार खारिज करने का आरोप
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने उनके द्वारा प्रस्तुत जमानतदारों को चार बार अस्वीकार कर दिया। उनका तर्क था कि जमानतदारों को बार-बार खारिज किए जाने के कारण उन्हें हिरासत में रहना पड़ रहा है।
वहीं, सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने इन दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि निर्धारित कानूनी शर्तों का पालन नहीं किए जाने के कारण संबंधित व्यक्तियों को नए और वैध जमानतदार प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।
हाईकोर्ट ने इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जमानतदारों की वैधता और उनसे जुड़े तथ्यों की जांच सक्षम अपीलीय अदालत के समक्ष की जानी चाहिए।
शांति बॉन्ड की शर्तों को लेकर भी हुई सुनवाई
सुनवाई के दौरान शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए भरवाए जाने वाले बॉन्ड और उसकी शर्तों के पालन का मुद्दा भी सामने आया।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्तियों के आचरण और कानूनी शर्तों के पालन का परीक्षण महत्वपूर्ण होता है। पीठ ने सवाल उठाया कि क्या कोई व्यक्ति अलग-अलग मुद्दों का हवाला देकर बार-बार बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन कर सकता है।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार बदलने की प्रक्रिया चुनावों के माध्यम से पूरी होती है। हालांकि, मौजूदा मामले में न्यायिक परीक्षण का विषय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और संबंधित आदेशों की वैधता है।
अदालत की टिप्पणियों के बाद वापस ली याचिका
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित आदेशों के तथ्यात्मक और कानूनी पहलुओं की विस्तृत समीक्षा के लिए उपयुक्त अपीलीय मंच का सहारा लिया जाना चाहिए।
इसके बाद अदालत ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों को अपने मुवक्किलों से चर्चा करने का अवसर दिया।
दोपहर बाद दोबारा सुनवाई शुरू होने पर याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वे अपनी याचिका वापस लेना चाहते हैं। हाईकोर्ट ने इसकी अनुमति देते हुए मामले का निपटारा कर दिया।
अब आगे क्या होगा?
याचिका वापस लिए जाने के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका के लिए संबंधित आदेशों को चुनौती देने का वैधानिक विकल्प महत्वपूर्ण हो गया है। वे कानून के अनुसार सक्षम न्यायिक मंच पर अपनी दलीलें प्रस्तुत कर सकते हैं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने हिरासत बढ़ाने के आदेशों की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। अदालत की सुनवाई मुख्य रूप से कानूनी प्रक्रिया और उपलब्ध वैकल्पिक उपायों के इस्तेमाल पर केंद्रित रही।





