अंतागढ़। कांकेर जिले के अंतागढ़ क्षेत्र से बदलाव की एक प्रेरक तस्वीर सामने आई है। कभी माओवादी संगठन का हिस्सा रहे मैनू नेगी ने हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने के बाद अब नई जिंदगी की शुरुआत की है। शासन की पुनर्वास नीति के तहत मिले प्रशिक्षण का उपयोग करते हुए मैनू अब प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बन रहे अपने घर में खुद राजमिस्त्री का काम कर रहे हैं।

भैंसासुर से सामने आई बदलाव की कहानी

अंतागढ़ विकासखंड की भैंसासुर पंचायत के कोयापारा निवासी मैनू नेगी का जीवन लंबे समय तक संघर्ष और हिंसा से जुड़ा रहा। जिस इलाके में कभी माओवादी गतिविधियों का प्रभाव था, वहीं अब मैनू की कहानी बदलाव और आत्मनिर्भरता की नई मिसाल बन रही है।

17-18 साल की उम्र में माओवादी संगठन से जुड़ा था मैनू

अंतागढ़ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक आशीष बंछोर के मुताबिक, वर्ष 2008 के आसपास जब उत्तर बस्तर क्षेत्र में माओवादी गतिविधियां तेज थीं, तब महज 17-18 वर्ष की उम्र में मैनू संगठन के संपर्क में आया और एक युवा सदस्य के रूप में उसमें शामिल हो गया।

समय के साथ संगठन में उसकी जिम्मेदारियां बढ़ती गईं और वह उत्तर बस्तर-कांकेर क्षेत्र में DVC कमांडिंग इन चीफ की भूमिका तक पहुंचा।

हिंसा छोड़ मुख्यधारा में लौटने का लिया फैसला

लंबे समय तक संगठन से जुड़े रहने के बाद मैनू ने अपनी जिंदगी की दिशा बदलने का फैसला किया। हिंसा से दूर होकर सामान्य और सम्मानजनक जीवन की ओर लौटना उसके जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुआ।

जुलाई 2025 में पत्नी के साथ किया आत्मसमर्पण

मैनू ने जुलाई 2025 में अपनी पत्नी के साथ पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया। इसके बाद शासन की पुनर्वास नीति के तहत उसे नई जिंदगी शुरू करने के लिए सहायता और कौशल विकास से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया।

पुनर्वास के दौरान मैनू के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने परिवार के लिए स्थायी और सम्मानजनक आजीविका तैयार करने की थी।

ड्राइविंग समेत कई कौशल का मिला प्रशिक्षण

पुनर्वास कैंप में मैनू को अलग-अलग तरह के रोजगारपरक प्रशिक्षण दिए गए। इनमें ड्राइविंग प्रशिक्षण भी शामिल था। मैनू अब भविष्य में वाहन चलाकर रोजगार हासिल करने और अपने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की योजना बना रहा है।

अपने हाथों से बना रहा प्रधानमंत्री आवास

मैनू की नई जिंदगी की सबसे खास तस्वीर उसके बन रहे घर में दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बन रहे मकान में वह खुद राजमिस्त्री का काम कर रहा है।

पुनर्वास के दौरान मिले हुनर का इस्तेमाल करते हुए मैनू ईंट जोड़ने, गारा लगाने और दीवारें खड़ी करने का काम खुद कर रहा है। उसके लिए यह केवल एक मकान नहीं, बल्कि पुराने जीवन को पीछे छोड़कर नई शुरुआत का प्रतीक भी है।

बंदूक की जगह अब हाथों में ईंट और गारा

कभी जिस जिंदगी में हिंसा और हथियार शामिल थे, अब उसी जिंदगी में मेहनत, रोजगार और आत्मनिर्भरता की जगह बन रही है। मैनू अपने परिवार के लिए खुद आशियाना तैयार कर रहा है और नए भविष्य की ओर बढ़ रहा है।

भैंसासुर में बदल रही पहचान

भैंसासुर की पहचान लंबे समय तक माओवादी गतिविधियों और भय के माहौल से जुड़ी रही है। मैनू नेगी की कहानी इस क्षेत्र में हो रहे सामाजिक बदलाव की एक तस्वीर पेश करती है।

यह कहानी बताती है कि आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास केवल मुख्यधारा में वापसी तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजगार, कौशल विकास और आत्मनिर्भर जीवन के अवसर भी नई शुरुआत में अहम भूमिका निभाते हैं।