रायपुर/बस्तर: नेशनल हाईवे-30 पर बालेंगा कोसा सेंटर के पास रॉयल ट्रेवल्स की बस के पलटने से हुई शिक्षिका पद्मनी चंद्रवंशी की दर्दनाक मौत और 15 यात्रियों के घायल होने की घटना ने एक बार फिर हमारी लचर परिवहन व्यवस्था की पोल खोल दी है। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी और बस ऑपरेटरों की मनमानी का जीता-जागता सबूत है।
लगातार हो रही इन दुर्घटनाओं के मद्देनजर, अब समय आ गया है कि मोटर वाहन (MV) अधिनियम और माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के सड़क सुरक्षा दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
इस गंभीर मुद्दे पर छत्तीसगढ़ के परिवहन विभाग और सरकार से निम्नलिखित सवाल और सख्त कदम उठाने की तत्काल दरकार है:
- मंत्रियों और अधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी: इतने गंभीर हादसे और लगातार हो रही मौतों के बावजूद, परिवहन मंत्री और संबंधित आला अधिकारियों की ओर से सड़क सुरक्षा को लेकर कोई बयान या स्पष्टीकरण क्यों नहीं आया है? आम जनता की जान जाने पर जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की यह खामोशी उनके संवेदनहीन रवैये को दर्शाती है। आखिर इस लापरवाही पर वे चुप क्यों हैं?
- लगातार हो रहे हादसों पर जवाबदेही: NH-30 पर सड़क दुर्घटनाएं अब एक खौफनाक आम बात हो गई हैं। स्थिति यह है कि इस हाईवे पर एक महीने में 8 से 10 बस हादसे होना एक आम बात बन चुकी है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बस ऑपरेटरों द्वारा यात्रियों की सुरक्षा, वाहनों के रखरखाव और गति सीमा की पूरी तरह अनदेखी की जा रही है।
- स्टेज कैरिज परमिट (Stage Carriage Permit) हो रद्द: ऐसे लापरवाह ऑपरेटरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए उनका परमिट तुरंत रद्द किया जाना चाहिए। जब तक 'रिफॉल्टर' ऑपरेटरों पर कानूनी हथौड़ा नहीं चलेगा, तब तक सड़कों पर मौत का यह खेल नहीं रुकेगा।
- सार्वजनिक सेवा बनाम निजी संपत्ति: परिवहन विभाग को यह समझना होगा कि यात्री बसें किसी ऑपरेटर की 'निजी जागीर' या सिर्फ अंधाधुंध कमाई का साधन नहीं हैं। इनका मुख्य उद्देश्य 'जन कल्याण' (Public Welfare) और सुरक्षित सफर तय कराना है।
- बसों की बेहतर फ्रीक्वेंसी तय हो: सरकार को इन व्यस्त मार्गों पर बसों की फ्रीक्वेंसी इस तरह तय करनी चाहिए कि ऑपरेटरों के बीच ज्यादा सवारियां बैठाने की जानलेवा होड़ न मचे।
निष्कर्ष: परिवहन विभाग का काम केवल परमिट बांटना नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। अगर ऑपरेटर नियमों का पालन नहीं कर सकते, तो उन्हें इस जनसेवा से बाहर कर देना चाहिए। और कितनी जानें जाएंगी, तब जाकर सिस्टम नींद से जागेगा?





