नई दिल्ली। हॉकी विश्व कप में इस बार भारतीय अंपायरिंग का प्रतिनिधित्व नजर नहीं आएगा। नीदरलैंड्स और बेल्जियम में 15 अगस्त से शुरू होने वाले विश्व कप के लिए चुने गए अंपायरों और तकनीकी अधिकारियों की सूची में एक भी भारतीय को जगह नहीं मिली है। करीब 28 साल बाद ऐसा मौका आया है, जब हॉकी के इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में कोई भारतीय अंपायर या तकनीकी अधिकारी शामिल नहीं होगा। इस स्थिति पर देश के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अंपायरों ने निराशा जताते हुए बेहतर योजना और ज्यादा अवसर देने की जरूरत बताई है।
1998 के बाद पहली बार भारतीय अंपायर नहीं
साल 1998 में नीदरलैंड्स के यूट्रेक्ट में आयोजित विश्व कप के बाद यह पहला अवसर है, जब टूर्नामेंट के अंपायर या तकनीकी अधिकारियों में भारत का कोई प्रतिनिधि नहीं है। इस बार चयनित अधिकारियों की सूची में यूरोपीय देशों का दबदबा देखने को मिल रहा है।
भारत के आरवी रघु प्रसाद, सतिंदर शर्मा, तरलोक सिंह भुल्लर और अमरजीत सिंह बावा जैसे अंपायर इससे पहले विश्व कप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
बड़े टूर्नामेंटों के प्रदर्शन पर होता है चयन
पिछले साल 47 वर्ष की उम्र में अंपायरिंग से संन्यास लेने वाले आरवी रघु प्रसाद के मुताबिक, बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों के लिए अंपायरों की नियुक्ति अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (FIH) की अंपायरिंग समिति करती है। चयन के दौरान पिछले बड़े टूर्नामेंटों और प्रो लीग में अंपायरों के प्रदर्शन को प्रमुख आधार बनाया जाता है।
रघु प्रसाद का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खासकर यूरोपीय अंपायरों के बीच अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं है। उन्होंने अंपायरिंग के पेशे में वित्तीय सुरक्षा की कमी का मुद्दा भी उठाया। खिलाड़ियों को बेहतर प्रदर्शन पर पुरस्कार और सरकारी नौकरियों जैसे अवसर मिलते हैं, जबकि अंपायरों के लिए ऐसी सुविधाएं बेहद सीमित हैं।
भारत में 170 से ज्यादा पुरुष और महिला अंपायर
हॉकी इंडिया की वेबसाइट पर मई 2025 में अपडेट की गई सूची के अनुसार, अंपायरों को चार श्रेणियों—कोर लीडिंग पैनल, लीडिंग पैनल, हाई पोटेंशियल और नेशनल अंपायर—में रखा गया है।
पुरुष वर्ग में 100 से अधिक और महिला वर्ग में 70 से ज्यादा अंपायरों के नाम दर्ज हैं। पुरुष वर्ग में छह अंपायर FIH पैनल का हिस्सा रहे हैं, हालांकि इनमें रघु प्रसाद अब संन्यास ले चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव के लिए ज्यादा मौके जरूरी
पूर्व अंतरराष्ट्रीय अंपायर सतिंदर शर्मा ने भारतीय अंपायरों को अधिक एक्सपोजर देने की जरूरत बताई। उनका मानना है कि यदि घरेलू अंपायरों को बड़े मुकाबलों और महत्वपूर्ण टूर्नामेंटों में जिम्मेदारी नहीं मिलेगी, तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए जरूरी अनुभव हासिल करने में मुश्किल होगी।
उन्होंने कहा कि भारतीय अंपायरिंग के लिए मजबूत योजना और व्यवस्थित ढांचा तैयार करना जरूरी है, ताकि अगले विश्व कप और ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों में भारत का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
अंपायरिंग में वित्तीय सुरक्षा भी बड़ी चुनौती
पूर्व अंपायर अमरजीत सिंह बावा ने भी अंपायरों को पर्याप्त सम्मान और सुविधाएं दिए जाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने अपने दौर को याद करते हुए कहा कि पहले अंपायरों को खेल व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा तक नहीं माना जाता था। बाद में उनके प्रयासों से अंपायरों को सम्मान और स्मृति चिन्ह देने जैसी पहल शुरू हुई।
पूर्व अंपायरों के मुताबिक, इस क्षेत्र में वित्तीय सुरक्षा आज भी बड़ी चुनौती है। पुराने दौर में घरेलू मुकाबलों के लिए प्रतिदिन करीब 150 से 200 रुपये और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगभग 40 से 50 डॉलर का भत्ता मिलता था। उनका मानना है कि भारतीय हॉकी को अच्छे खिलाड़ियों के साथ उच्च स्तर के अंपायर तैयार करने पर भी गंभीरता से काम करना होगा।





