नई दिल्ली। 15 अगस्त से शुरू होने जा रहे हॉकी विश्वकप से पहले भारतीय हॉकी के स्वर्णिम इतिहास की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। विश्वकप के इतिहास में भारत के चार ऐसे दिग्गज खिलाड़ी रहे हैं, जिन्होंने तीन-तीन विश्वकप में पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। इन खिलाड़ियों ने 1970 के दशक में भारतीय हॉकी को विश्व स्तर पर नई पहचान दिलाई।
अशोक कुमार: फाइनल में किया था ऐतिहासिक गोल
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के पुत्र अशोक कुमार भारतीय टीम के सबसे भरोसेमंद फॉरवर्ड खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। 1975 के कुआलालंपुर विश्वकप के फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ उनका निर्णायक गोल भारत को पहला और अब तक का एकमात्र विश्वकप खिताब दिलाने वाला साबित हुआ। खेल से संन्यास लेने के बाद उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को प्रशिक्षित कर भारतीय हॉकी को नई दिशा दी।
हरचरण सिंह: रफ्तार से विरोधियों पर भारी
1970 के दशक के तेजतर्रार खिलाड़ियों में शामिल हरचरण सिंह अपनी गति और आक्रामक खेल शैली के लिए प्रसिद्ध थे। 1975 विश्वकप में मेजबान मलेशिया के खिलाफ अतिरिक्त समय में किया गया उनका गोल भारतीय टीम के लिए निर्णायक साबित हुआ। खिलाड़ी जीवन के बाद भी उन्होंने युवा प्रतिभाओं के मार्गदर्शन में अहम भूमिका निभाई।
माइकल किंडो: मजबूत रक्षा पंक्ति की पहचान
ओडिशा की आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाले माइकल किंडो भारतीय हॉकी के सबसे भरोसेमंद फुलबैक माने जाते थे। मजबूत डिफेंस, सटीक टैकल और शांत स्वभाव उनकी सबसे बड़ी पहचान थी। वर्ष 1972 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके योगदान को सम्मान देते हुए ओडिशा सरकार ने उनके नाम पर खेल प्रतिभाओं के लिए विशेष योजना भी शुरू की।
अजित पाल सिंह: कप्तानी से रचा स्वर्णिम इतिहास
भारतीय हॉकी के महान मिडफील्डरों में शुमार अजित पाल सिंह ने 1975 विश्वकप में कप्तान के रूप में टीम का नेतृत्व किया। उनकी रणनीति और नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान को हराकर विश्व चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया। खिलाड़ी जीवन के बाद भी वे भारतीय हॉकी के विकास और प्रशासनिक गतिविधियों से जुड़े रहे।
विश्वकप में भारत का शानदार रिकॉर्ड
भारतीय हॉकी ने अब तक विश्वकप में 31 पदक विजेता खिलाड़ी दिए हैं, जिन्होंने मिलकर कुल 167 पदक अपने नाम किए हैं। इनमें सात खिलाड़ियों ने स्वर्ण पदक जीतने का गौरव हासिल किया, जबकि तीन खिलाड़ियों के खाते में केवल रजत पदक दर्ज हैं।
1986 के बाद पदक का इंतजार
भारत ने 1971 में कांस्य, 1973 में रजत और 1975 में स्वर्ण पदक जीतकर विश्व हॉकी में अपना दबदबा बनाया था। हालांकि 1986 से विश्वकप सिंथेटिक टर्फ पर खेले जाने के बाद भारतीय टीम अब तक कोई पदक हासिल नहीं कर सकी है। ऐसे में 2026 विश्वकप में एक बार फिर इतिहास दोहराने की उम्मीद की जा रही है।





