रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र में मुख्यमंत्री की ओर से दिए गए लिखित जवाबों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। दंतेवाड़ा जिले में आरती स्पंज एंड पावर लिमिटेड को लौह अयस्क खदान आवंटन से जुड़े एक ही विषय पर पूछे गए तीन अलग-अलग सवालों के जवाबों में विरोधाभास सामने आया है। इस मामले ने विधानसभा में अधिकारियों द्वारा तैयार किए जाने वाले जवाबों की विश्वसनीयता और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

एक ही विषय पर तीन सवाल, तीन अलग-अलग जवाब

विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान भाजपा और कांग्रेस के विधायकों ने दंतेवाड़ा जिले में आरती स्पंज एंड पावर लिमिटेड को लौह अयस्क खदान की लीज और खनन गतिविधियों को लेकर अलग-अलग प्रश्न लगाए थे। इन सभी प्रश्नों का उत्तर मुख्यमंत्री की ओर से लिखित रूप में दिया गया, लेकिन तीनों उत्तरों में तथ्य अलग-अलग पाए गए।

पहला जवाब: लीज मिलने और खनन होने की पुष्टि

भाजपा विधायक सुशांत शुक्ला ने पूछा था कि दंतेवाड़ा के अलनार क्षेत्र में लौह अयस्क की खदान किस कंपनी को आवंटित की गई और अब तक कितना खनन हुआ।

सरकार के लिखित जवाब में कहा गया कि:

अलनार क्षेत्र में आरती स्पंज एंड पावर लिमिटेड को 31.55 हेक्टेयर क्षेत्र में लौह अयस्क खदान की लीज दी गई।

लीज 7 जनवरी 2017 से 6 जनवरी 2067 तक, यानी 50 वर्षों के लिए स्वीकृत है।

जून 2026 तक लगभग 4.87 लाख टन लौह अयस्क का उत्पादन किया जा चुका है।

सरकार को रॉयल्टी और अन्य मदों से राजस्व भी प्राप्त हुआ है।

इस संबंध में प्राप्त शिकायतों की जांच जिला स्तरीय समिति कर रही है।

दूसरा जवाब: कहा गया कोई लीज ही नहीं दी गई

कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी ने पिछले पांच वर्षों में निजी कंपनियों को दी गई लौह अयस्क लीज की जानकारी मांगी और विशेष रूप से आरती स्पंज एंड पावर लिमिटेड का उल्लेख किया।

इस प्रश्न के उत्तर में सरकार ने कहा कि:

पिछले पांच वर्षों में किसी भी निजी कंपनी को लौह अयस्क के लिए जमीन लीज पर नहीं दी गई।

आरती स्पंज एंड पावर लिमिटेड को भी कोई लीज नहीं दी गई।

इसलिए आगे के प्रश्न लागू नहीं होते।

तीसरा जवाब: खनन अनुमति से भी इनकार

कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव ने दंतेवाड़ा के आरसनार क्षेत्र में आरती स्पंज कंपनी को खनन अनुमति दिए जाने और उससे जुड़ी शिकायतों की जानकारी मांगी।

सरकार ने उत्तर दिया कि:

आरसनार क्षेत्र में आरती स्पंज कंपनी को खनन की अनुमति नहीं दी गई।

इसलिए शेष प्रश्न का उत्तर देने का प्रश्न ही नहीं उठता।

आखिर विरोधाभास क्यों?

मामले में सबसे बड़ा विवाद यह है कि पहले उत्तर में सरकार स्वयं स्वीकार करती है कि कंपनी को खदान की लीज दी गई और उत्पादन भी हो चुका है, जबकि दूसरे उत्तर में कहा गया कि पिछले पांच वर्षों में कोई लीज नहीं दी गई। वहीं तीसरे उत्तर में क्षेत्र के नाम के अंतर के आधार पर अनुमति से इनकार कर दिया गया।

रिपोर्ट के अनुसार अधिकारियों ने प्रश्नों की भाषा और समयावधि के आधार पर अलग-अलग तकनीकी व्याख्या करते हुए उत्तर तैयार किए, जिससे एक ही विषय पर अलग-अलग तथ्य सामने आ गए।

विधानसभा की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

राजनीतिक और संसदीय मामलों के जानकारों का मानना है कि विधानसभा में दिए जाने वाले उत्तर केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं होते, बल्कि सरकार का आधिकारिक रिकॉर्ड माने जाते हैं। ऐसे में यदि एक ही विषय पर विरोधाभासी उत्तर दर्ज हों, तो इससे सरकार की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि विभागीय अधिकारी उत्तर तैयार करते हैं और मंत्री या मुख्यमंत्री उन्हें सदन में प्रस्तुत करते हैं। इसलिए जवाबों की तथ्यात्मक जांच और सत्यापन बेहद आवश्यक है, ताकि विधानसभा में सही जानकारी दर्ज हो और जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही बनी रहे।

विपक्ष को मिला नया मुद्दा

विधानसभा में सामने आए इस विरोधाभास के बाद विपक्ष को सरकार को घेरने का नया मुद्दा मिल गया है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मामले को लेकर सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की जा सकती है। साथ ही यह भी सवाल उठ रहे हैं कि यदि एक ही विषय पर अलग-अलग जवाब दर्ज हुए हैं तो सही तथ्य कौन-सा है और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी।